भारत आज पूरे उत्साह और गर्व के साथ अपना 77वां गणतंत्र दिवस मना रहा है। यह पावन अवसर केवल एक संवैधानिक तिथि नहीं, बल्कि देश की आत्मा, लोकतांत्रिक मूल्यों और राष्ट्रीय स्वाभिमान का उत्सव है। इस ऐतिहासिक दिन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गणतंत्र दिवस को देश की आन, बान और शान का प्रतीक बताया और कहा कि यह पर्व हमें राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों की याद दिलाता है।
गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर राष्ट्रपति ने देशवासियों को संबोधित करते हुए कहा कि यह राष्ट्रीय पर्व हमें हमारे अतीत, वर्तमान और भविष्य—तीनों पर चिंतन करने का अवसर प्रदान करता है। उन्होंने कहा कि गणतंत्र दिवस हमें यह समझने में मदद करता है कि देश ने किन संघर्षों से गुजरकर यह मुकाम हासिल किया है, आज हम कहां खड़े हैं और आने वाले समय में हमें किस दिशा में आगे बढ़ना है।
“आन-बान-शान का प्रतीक राष्ट्रीय उत्सव”
राष्ट्रपति ने स्वतंत्रता संग्राम का स्मरण करते हुए कहा कि 15 अगस्त 1947 को भारत ने पराधीनता की बेड़ियां तोड़ीं और अपनी राष्ट्रीय नियति का स्वयं निर्माता बना। स्वतंत्रता के बाद संविधान के माध्यम से देश ने एक सशक्त लोकतांत्रिक गणराज्य का स्वरूप अपनाया, जिसने प्रत्येक नागरिक को समान अधिकार और सम्मान दिया।
अपने संबोधन में उन्होंने राष्ट्रीय एकता पर विशेष बल दिया। उन्होंने कहा कि भारत की विविधता ही उसकी सबसे बड़ी शक्ति है और राष्ट्रीय एकता के स्वरूप को जीवित रखने के लिए किए जा रहे सभी प्रयास अत्यंत सराहनीय हैं। एकता, अखंडता और भाईचारे की भावना ही देश को निरंतर प्रगति के पथ पर आगे बढ़ाती है।
एकता और भविष्य की दिशा का पर्व
राष्ट्रपति ने यह भी उल्लेख किया कि पिछले वर्ष 7 नवंबर से हमारे राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’ की रचना की 150वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में देशभर में विभिन्न समारोह आयोजित किए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि ‘वंदे मातरम्’ केवल एक गीत नहीं, बल्कि भारत माता के दिव्य स्वरूप की आराधना है। यह गीत भारतीय जनमानस में राष्ट्रीय गौरव, आत्मसम्मान और देशभक्ति की भावना का संचार करता है।
उन्होंने कहा कि ‘वंदे मातरम्’ प्रत्येक भारतीय के हृदय में मातृभूमि के प्रति श्रद्धा और समर्पण की भावना को जागृत करता है और हमें यह याद दिलाता है कि देश सर्वोपरि है।
77वां गणतंत्र दिवस हमें यह संकल्प लेने का अवसर देता है कि हम संविधान के आदर्शों, स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान और राष्ट्रीय मूल्यों की रक्षा करते हुए भारत को एक सशक्त, समावेशी और आत्मनिर्भर राष्ट्र बनाने के लिए निरंतर प्रयास करते रहेंगे। यही इस राष्ट्रीय पर्व की सच्ची भावना और सार है।

