US-Iran Talk Fail: अमेरिकी उपराष्ट्रपति और डेलीगेशन लीडर जेडी वेंस ने बातचीत के असफल होने पर गहरी निराशा व्यक्त की। उन्होंने कहा, “बुरी खबर यह है कि हम किसी समझौते पर नहीं पहुंच पाए हैं। मुझे लगता है कि यह अमेरिका के लिए बुरी खबर से कहीं ज्यादा ईरान के लिए बुरी खबर है।” वेंस ने साफ किया कि अमेरिकी प्रशासन सद्भावना के साथ टेबल पर आया था, लेकिन ईरानी शासन (Iranian Regime) ने शर्तों को मानने से इनकार कर दिया। अब अमेरिकी टीम वापस वाशिंगटन लौट रही है।
पाकिस्तान की भूमिका पर बोले उपराष्ट्रपति
वार्ता के विफल होने के बावजूद, जेडी वेंस ने मेजबान देश पाकिस्तान की भूमिका का बचाव किया। उन्होंने कहा कि बातचीत में जो भी कमियां रहीं, वे पाकिस्तानियों की वजह से नहीं थीं। पाकिस्तान ने दोनों देशों के बीच मतभेदों को सुलझाने और समझौते तक पहुँचने में सराहनीय मध्यस्थता की। वेंस के अनुसार, पिछले 21 घंटों में कई महत्वपूर्ण चर्चाएं हुईं, लेकिन अंततः ईरानी पक्ष अमेरिकी प्रस्तावों पर सहमत नहीं हो सका।
अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा टीम से परामर्श
इस वार्ता के दौरान जेडी वेंस लगातार अमेरिका में राष्ट्रपति और अपनी पूरी सुरक्षा टीम के संपर्क में थे। उन्होंने बताया कि एडमिरल ब्रैड कूपर (CENTCOM कमांडर), युद्ध सचिव पीट हेगसेथ और विदेश सचिव मार्को रुबियो के साथ हर कदम पर चर्चा की गई। अमेरिका ने एक ‘अंतिम और सर्वोत्तम प्रस्ताव’ (Final and Best Offer) पेश किया था। वेंस ने कहा कि अब यह ईरान पर निर्भर है कि वे भविष्य में इसे स्वीकार करते हैं या नहीं।
असफलता के मुख्य कारण
विशेषज्ञों के अनुसार, इस शांति वार्ता के टूटने के पीछे दो सबसे बड़ी वजहें रहीं। पहली बड़ी वजह होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) है। ईरान इस सामरिक रास्ते पर पूर्ण नियंत्रण चाहता है, जबकि अमेरिका इसे एक अंतरराष्ट्रीय जलमार्ग मानकर स्वतंत्र आवाजाही पर अड़ा है। दूसरी वजह परमाणु कार्यक्रम (Nuclear Program) रही। अमेरिका की मांग थी कि ईरान अपना समृद्ध यूरेनियम या तो उन्हें सौंपे या नष्ट करे, जिसे ईरान ने सिरे से खारिज कर दिया।
युद्ध का मंडराता खतरा
डिफेंस एक्सपर्ट संजय सोई का मानना है कि इस विफलता के बाद क्षेत्र में फिर से युद्ध के बादल मंडराने लगेंगे। उन्होंने कहा कि होर्मुज का मुद्दा अब अमेरिका के लिए साख का सवाल बन चुका है। ईरान में सत्ता परिवर्तन की कोशिशों के बाद भी जमीनी हालात नहीं बदले हैं। अमेरिका अपनी वैश्विक साख बचाने के लिए इन शर्तों पर सख्त रुख अपनाए हुए है।
ईरान की जवाबी प्रतिक्रिया
दूसरी ओर, ईरान ने इस विफलता का ठीकरा अमेरिका पर फोड़ा है। ईरानी अधिकारियों ने कहा कि अमेरिका की ओर से बहुत ज्यादा और कठोर मांगें (Excessive Demands) रखी गई थीं। उन्होंने स्पष्ट किया कि ईरान अपनी संप्रभुता और सामरिक हितों से समझौता करके किसी भी कीमत पर इन शर्तों को मानने के लिए तैयार नहीं था। इस गतिरोध ने मध्य-पूर्व में तनाव को एक बार फिर चरम पर पहुँचा दिया है।

