कोलकाता/मालदा: पश्चिम बंगाल में निष्पक्ष चुनाव संपन्न कराने की दिशा में निर्वाचन आयोग (Election Commission) ने एक बड़ा और कड़ा कदम उठाया है। मालदा और राज्य के अन्य हिस्सों में हुई हालिया हिंसक घटनाओं को गंभीरता से लेते हुए आयोग ने सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस (TMC) के नेताओं को मिल रही अतिरिक्त सुरक्षा और पुलिस बल की तैनाती पर कड़ी आपत्ति जताई है। आयोग का मानना है कि सरकारी सुरक्षा घेरे का इस्तेमाल चुनावी लाभ या अनुचित प्रभाव डालने के लिए किया जा सकता है।
सरकारी सुरक्षा का दुरुपयोग रोकने हेतु सख्त निर्देश और अयोग्यता की समीक्षा
निर्वाचन आयोग ने स्पष्ट आदेश दिया है कि आपराधिक पृष्ठभूमि वाले राजनेताओं और व्यक्तियों को दी गई राज्य सुरक्षा तत्काल प्रभाव से हटाई जाए। जिला प्रशासन को निर्देश दिए गए हैं कि वे ऐसे नेताओं के पदों और उन्हें वास्तव में ‘खतरे की आशंका’ (Threat Perception) का नए सिरे से आकलन करें।
आयोग ने जिला अधिकारियों से कहा है कि सुरक्षा मानदंडों का उल्लंघन करने वाले या बिना किसी ठोस खतरे के सुरक्षा लेकर घूमने वाले व्यक्तियों को ‘सुरक्षा के लिए अयोग्य’ (Ineligible for Protection) घोषित किया जाए। इस कदम का मुख्य उद्देश्य सरकारी संसाधनों के दुरुपयोग को रोकना और चुनाव के दौरान सभी दलों के लिए समान अवसर (Level Playing Field) सुनिश्चित करना है।
TMC नेताओं की सुरक्षा समीक्षा और पुलिस महानिदेशक को 48 घंटे का अल्टीमेटम
आयोग ने विशेष रूप से तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 36 बड़े नेताओं को दी जा रही भारी पुलिस सुरक्षा पर सवाल उठाए हैं। सूत्रों के अनुसार, चुनाव की घोषणा से पहले तक राज्य में 832 TMC नेताओं और 144 अन्य व्यक्तियों की सुरक्षा में 2,185 पुलिसकर्मी तैनात थे। आयोग ने इसे ‘पक्षपातपूर्ण व्यवस्था’ (Biased Policing) करार दिया है क्योंकि यह तैनाती आयोग की पूर्व अनुमति के बिना जारी रखी गई थी।
पश्चिम बंगाल के पुलिस महानिदेशक (DGP) सिद्धनाथ गुप्ता को निर्देश दिया गया है कि वे अगले 2-3 दिनों के भीतर इस सुरक्षा व्यवस्था की निष्पक्ष समीक्षा करें। साथ ही, राज्य पुलिस नोडल अधिकारी को आज, 4 अप्रैल तक एक व्यापक रिपोर्ट प्रस्तुत करने को कहा गया है, जिसमें प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र में सुरक्षा प्राप्त व्यक्तियों के नाम और उनके पद का पूरा विवरण शामिल हो।
दागी राजनेताओं पर कार्रवाई और गैर-जमानती वारंट (NBW) का सख्ती से पालन
चुनाव आयोग ने केवल सुरक्षा हटाने तक ही सीमित नहीं रहा है, बल्कि कानून व्यवस्था को लेकर भी कड़ा रुख अपनाया है। आयोग ने निर्देश दिया है कि जो नेता आपराधिक मामलों का सामना कर रहे हैं, या जो जमानत और पैरोल पर बाहर हैं, उनकी सुरक्षा तुरंत वापस ली जाए।
इसके अतिरिक्त, पुलिस को ‘पेंडिंग गैर-जमानती वारंट’ (Pending Non-Bailable Warrants) को लागू करने के लिए 10 दिन की समय सीमा दी गई है। आयोग ने नाराजगी जताई है कि अब तक बंगाल पुलिस की ओर से इन वारंटों के अनुपालन को लेकर कोई संतोषजनक रिपोर्ट नहीं मिली है। आयोग ने साफ कर दिया है कि आरोपियों की गिरफ्तारी में किसी भी तरह की कोताही बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
मालदा हिंसा के बाद प्रशासनिक सर्जरी और चुनावी सुचिता सुनिश्चित करना
यह पूरी कवायद मालदा में हाल ही में हुए बवाल और हिंसक झड़पों के बाद शुरू हुई है। आयोग को आशंका है कि सुरक्षा प्राप्त प्रभावशाली व्यक्ति चुनाव प्रक्रिया में बाधा डाल सकते हैं। प्रशासन को आदेश दिया गया है कि वे अपराधियों और चुनावी बाधाओं को दूर करने के लिए ‘त्वरित पुलिस कार्रवाई’ (Prompt Police Action) सुनिश्चित करें।
आयोग की इस फटकार और सख्ती के बाद अब राज्य पुलिस महकमे में हड़कंप मच गया है। अब देखना यह है कि 10 दिनों के भीतर कितने दागी चेहरों को जेल के पीछे भेजा जाता है और कितने नेताओं के काफिले से लाल बत्तियां और पुलिस की गाड़ियाँ कम होती हैं। बंगाल चुनाव के इतिहास में यह निर्णय शांतिपूर्ण मतदान की दिशा में निर्णायक साबित हो सकता है।

