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Ramayana Teaser: ऋतिक रोशन ने वीएफएक्स की आलोचना करने वालों को दिया करारा जवाब, बताया विजन और तकनीक का अंतर

भारतीय सिनेमा की सबसे महंगी फिल्म मानी जा रही ‘रामायण’ का टीजर सामने आते ही इंटरनेट पर चर्चाओं का बाजार गर्म है। जहाँ एक तरफ रणबीर कपूर के ‘श्री राम’ अवतार को सराहा जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ फिल्म में इस्तेमाल किए गए स्पेशल इफेक्ट्स और कंप्यूटर जनित दृश्यों (CGI) को लेकर कुछ लोग असंतुष्ट नजर आ रहे हैं। इसी बीच ऋतिक रोशन ने एक भावुक और तकनीकी पोस्ट साझा कर फिल्म की मेकिंग और विजुअल स्टाइल के पीछे की मेहनत का बचाव किया है।

रामायण के टीजर पर बवाल

फिल्म की घोषणा के वक्त से ही दर्शक इस बात को लेकर संशय में थे कि क्या आधुनिक तकनीक के साथ रामायण की आत्मा को पर्दे पर उतारा जा सकेगा। टीजर आउट होने के बाद कई यूजर्स ने फिल्म में दिखाए गए दृश्यों को ‘कार्टूनिश’ करार दिया। फिल्म निर्माण की विजुअल आर्ट (Cinematic Visual Arts) पर सवाल उठाते हुए लोगों ने इसकी तुलना ‘आदिपुरुष’ से करना शुरू कर दिया। हालांकि, ऋतिक रोशन का मानना है कि किसी भी फिल्म को कोसने से पहले उसके पीछे के ‘मेकर्स विजन’ को समझना बेहद जरूरी है।

ऋतिक रोशन का बचपन और स्पेशल इफेक्ट्स के प्रति उनका पुराना लगाव

ऋतिक ने अपनी पोस्ट में अपने बचपन की यादें साझा करते हुए बताया कि कैसे 11 साल की उम्र में वे ‘बैक टू द फ्यूचर’ जैसी फिल्मों से प्रभावित हुए थे। उन्होंने कहा कि डिजिटल इमेजरी और कैमरा ट्रिक्स (Digital Imagery and Camera Tricks) को समझने के लिए उन्होंने उस दौर में किताबें मंगवाई थीं। ऋतिक ने स्वीकार किया कि बुरे वीएफएक्स देखना उनके लिए भी मुश्किल होता है, खासकर जब वे खुद उस प्रोजेक्ट का हिस्सा हों, लेकिन तकनीक को कोसने से पहले कलाकारों की सालों की मेहनत का सम्मान करना चाहिए।

सिनेमाई हीरोज और बड़े पर्दे पर कहानियों को उतारने का जादुई विजन

ऋतिक ने ‘रामायण’ के मेकर्स के साथ-साथ ‘कल्कि’ और ‘बाहुबली’ जैसी फिल्मों के निर्देशकों को अपना असली हीरो बताया। उन्होंने अपने पिता राकेश रोशन का भी जिक्र किया जिन्होंने ‘कोई मिल गया’ और ‘कृष’ के जरिए भारतीय सिनेमा में विजुअल ग्राफ़िक्स (Visual Graphics in Indian Cinema) की नींव रखी थी। ऋतिक के अनुसार, ये मेकर्स केवल पैसा नहीं लगाते, बल्कि दर्शकों को वो अद्भुत अनुभव देना चाहते हैं जो उन्होंने खुद कभी महसूस किया था। उनके लिए यह एक ‘खूबसूरत कोशिश’ है।

फोटोरियलिज्म बनाम स्टोरीटेलिंग स्टाइल

आलोचकों को तकनीकी पाठ पढ़ाते हुए ऋतिक ने स्पष्ट किया कि हर वीएफएक्स फिल्म ‘फोटोरियलिस्टिक’ नहीं होती। उन्होंने समझाया कि सिनेमैटिक स्टोरीटेलिंग स्टाइल्स (Cinematic Storytelling Styles) अलग-अलग हो सकते हैं। कुछ फिल्में ‘जेम्स बॉन्ड’ की तरह असल दिखती हैं (फोटोरियलिज्म), तो कुछ ‘300’ या ‘लॉर्ड ऑफ द रिंग्स’ की तरह काल्पनिक और मैजिकल स्टाइल में बनाई जाती हैं। ऋतिक ने कहा कि अगर किसी फिल्म का स्टाइल आपके सोचे हुए तरीके से अलग है, तो इसका मतलब यह नहीं कि वह तकनीक खराब है।

आलोचना से पहले समझें कलाकारों का संघर्ष

अंत में ऋतिक ने दर्शकों से अपील की कि वे तकनीकी विजुअलाइजेशन और आर्टिस्टिक वर्क (Technical Visualization and Artistic Work) को बिना सोचे-समझे बैश न करें। उन्होंने कहा कि पौराणिक कथाओं में ‘फोटोरियलिज्म’ लाना आसान नहीं है। मेकर्स अक्सर चीजों को ज्यादा ‘फैन्टास्किल’ या ‘हाइपररियल’ दिखाने के लिए एक खास स्टाइल चुनते हैं। उन्होंने दर्शकों को सलाह दी कि अगली बार जब वे किसी फिल्म के विजुअल्स को ‘बुरा’ कहें, तो पहले यह देख लें कि कहीं वह मेकर का एक सोचा-समझा ‘क्रिएटिव स्टाइल’ तो नहीं था।

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