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यूपी में घुसपैठियों की तलाश पर लगा ब्रेक: बंगाल सरकार नहीं दे रही रिकॉर्ड, जांच पर बढ़ा संकट

उत्तर प्रदेश में बांग्लादेश और म्यांमार से आए रोहिंग्या घुसपैठियों की बढ़ती गतिविधियों को देखते हुए सुरक्षा एजेंसियों ने बड़े पैमाने पर छानबीन शुरू की है। ये विदेशी नागरिक आंतरिक सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा माने जा रहे हैं। हालांकि, इस पूरी जांच प्रक्रिया में पश्चिम बंगाल सरकार बड़ा अवरोध साबित हो रही है। पुलिस और जांच एजेंसियों की ओर से कई बार रिकॉर्ड और नागरिकता संबंधी दस्तावेजों की मांग की गई, लेकिन बंगाल प्रशासन संदिग्धों की जानकारी उपलब्ध कराने में लगातार देरी कर रहा है। इससे यूपी की पुलिस किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंच पा रही है और कई मामले अधर में अटके हुए हैं।

1,000 से अधिक लोगों के दस्तावेजों की जांच

शहर की लगभग 16 बस्तियों में रह रहे 1,000 से अधिक लोगों के दस्तावेजों की जांच अब तक की जा चुकी है। इनमें से अधिकांश लोग खुद को असम, पश्चिम बंगाल, झारखंड या छत्तीसगढ़ का निवासी बताते हैं। लेकिन दस्तावेजों की बारीकी से जांच में कई विसंगतियाँ सामने आई हैं। कई आधार कार्ड, राशन कार्ड और निवास प्रमाणपत्र संदेह के घेरे में पाए गए हैं, जिनकी सत्यता पर सवाल खड़े हो गए हैं।

एजेंसियों से उनकी पुष्टि हो पा रही

जांच के दौरान 117 लोग ऐसे मिले जिनके कागजात अत्यंत संदिग्ध हैं। न तो उनके दस्तावेज जारी करने वाली एजेंसियों से उनकी पुष्टि हो पा रही है, न ही दिए गए पते सत्यापित हो रहे हैं। कई बार दस्तावेजों में उल्लेखित पते पर संपर्क करने पर यह पता चला कि वहाँ ऐसे किसी व्यक्ति का कोई रिकॉर्ड ही नहीं है। इससे यह आशंका और गहरी हो गई है कि ये लोग या तो फर्जी कागजात का इस्तेमाल कर रहे हैं, या फिर किसी बड़े घुसपैठ नेटवर्क का हिस्सा हैं।

वास्तविक नागरिकता की पुष्टि

जांच को तेज करने के लिए एक विशेष टीम सोमवार को असम और बंगाल के लिए रवाना हो चुकी है। इस टीम का काम संदिग्ध लोगों के मूल पते, दस्तावेजों की प्रमाणिकता और उनकी वास्तविक नागरिकता की पुष्टि करना है। टीम द्वारा स्थानीय अधिकारियों के साथ बैठकों और दस्तावेज सत्यापन के माध्यम से स्पष्ट जानकारी जुटाने का प्रयास किया जाएगा।

स्वयं को झारखंड का मूल निवासी बताया

इसी के साथ झारखंड सरकार से भी कई संदिग्ध लोगों के नागरिकता संबंधी विवरण मांगे गए हैं, क्योंकि कई व्यक्तियों ने स्वयं को झारखंड का मूल निवासी बताया है। जांच अधिकारियों के अनुसार, जब तक राज्यों से स्पष्ट और प्रमाणिक डेटा नहीं मिलता, तब तक घुसपैठियों की संख्या और उनकी गतिविधियों को लेकर सही निष्कर्ष निकालना संभव नहीं है।

पिछले कई वर्षों से यहां रह रहे

पुलिस का कहना है कि कई बस्तियों में रहने वाले लोग पिछले कई वर्षों से यहां रह रहे हैं। इस दौरान उन्होंने अस्थायी पहचान पत्र या फर्जी दस्तावेज बनवाकर स्थानीय समुदाय में घुलने-मिलने की कोशिश की। कुछ लोगों के बारे में यह भी पता चला है कि वे कई राज्यों में नौकरी या मजदूरी कर चुके हैं, जिससे उनकी पहचान और अधिक जटिल हो गई है।

सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि यदि बंगाल सरकार समय पर रिकॉर्ड उपलब्ध करा दे, तो जांच तेजी से आगे बढ़ सकती है। फिलहाल, जांच टीमों को विभिन्न राज्यों के बीच सत्यापन और दस्तावेजों के मेल-मिलान में काफी समय लग रहा है।

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