Unnao Rape Case: कुलदीप सेंगर को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका, जमानत का आदेश रद्दसुप्रीम कोर्ट ने साल 2017 के चर्चित उन्नाव दुष्कर्म मामले में सजायाफ्ता पूर्व विधायक कुलदीप सिंह सेंगर को तगड़ा कानूनी झटका दिया है। सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली हाईकोर्ट के उस आदेश को पूरी तरह निरस्त कर दिया है, जिसके तहत सेंगर की उम्रकैद की सजा को निलंबित (सस्पेंड) कर उसे जमानत दी गई थी। कोर्ट के इस फैसले के बाद अब सेंगर की जेल से बाहर आने की उम्मीदों पर फिलहाल पानी फिर गया है। यह कदम केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) द्वारा दायर की गई उस विशेष अपील पर आया है, जिसमें हाईकोर्ट के नरमी भरे रुख को चुनौती दी गई थी।
हाईकोर्ट को नए निर्देश
जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की खंडपीठ ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए दिल्ली हाईकोर्ट को स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए हैं। पीठ ने निर्देश दिया है कि कुलदीप सेंगर की जमानत याचिका और मुख्य सजा के खिलाफ लंबित अपील पर अब नए सिरे से विचार किया जाए। अदालत ने इसके लिए दो महीने की समय सीमा तय की है। सुप्रीम कोर्ट ने जोर देकर कहा कि हाईकोर्ट को इस मामले के सभी कानूनी पहलुओं को फिर से खंगालना चाहिए ताकि न्याय की गरिमा बनी रहे।
CBI की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट का निर्णय
उल्लेखनीय है कि दिल्ली हाईकोर्ट ने दिसंबर 2025 में एक आदेश पारित कर कुलदीप सेंगर की सजा को निलंबित करते हुए उसे बड़ी राहत दी थी। हालांकि, सीबीआई ने इस फैसले के खिलाफ तुरंत सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। सीबीआई की दलीलों को सुनने के बाद, शीर्ष अदालत ने पहले हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगाई थी और अब उसे पूरी तरह रद्द कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब तक हाईकोर्ट नए सिरे से फैसला नहीं लेता, तब तक सेंगर को कोई राहत नहीं मिलेगी।
न्यायिक निष्पक्षता की हिदायत
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान यह भी साफ किया कि दिल्ली हाईकोर्ट जब इस मामले पर दोबारा सुनवाई करेगा, तो वह पूरी तरह स्वतंत्र होकर अपना निर्णय ले। पीठ ने कहा कि हाईकोर्ट को सुप्रीम कोर्ट द्वारा पिछला आदेश रद्द किए जाने के तथ्य से प्रभावित होने की आवश्यकता नहीं है। अदालत ने इंगित किया कि इस मामले में कई ऐसे पेचीदा सवाल और साक्ष्य हैं, जिन पर हाईकोर्ट को एक बार फिर गहराई से गौर करने की जरूरत है।
कानूनी प्रक्रिया और नोटिस
इस पूरी कानूनी प्रक्रिया के दौरान, सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई की याचिका पर संज्ञान लेते हुए उत्तर प्रदेश सरकार और स्वयं कुलदीप सिंह सेंगर को नोटिस जारी कर उनका पक्ष भी मांगा था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस तरह के गंभीर जघन्य अपराधों में जमानत देते समय हर पहलू का बारीकी से मूल्यांकन अनिवार्य है। फिलहाल, सर्वोच्च न्यायालय के इस कड़े रुख ने पीड़िता के पक्ष में न्याय की उम्मीद को और मजबूत कर दिया है।

