AAP Split: आम आदमी पार्टी (AAP) के लिए शुक्रवार का दिन किसी राजनीतिक भूकंप से कम नहीं रहा। पार्टी के 10 राज्यसभा सांसदों में से 7 ने एक साथ इस्तीफा देकर भारतीय जनता पार्टी (BJP) की सदस्यता ले ली है। इस सामूहिक दलबदल ने न केवल संसद में AAP की शक्ति को आधा कर दिया है, बल्कि अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली इस पार्टी के राष्ट्रीय अस्तित्व पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं।
स्वाति मालीवाल हमला प्रकरण
पार्टी में मचे इस घमासान की नींव साल 2024 के उस चर्चित विवाद में छिपी है, जिसने AAP की छवि को भारी नुकसान पहुँचाया। स्वाति मालीवाल ने तत्कालीन मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के विश्वासपात्र सहयोगी पर मुख्यमंत्री आवास के भीतर शारीरिक हमले का आरोप लगाया था। 13 मई 2024 की उस घटना के बाद से ही मालीवाल और पार्टी नेतृत्व के बीच दूरियां बढ़ती गईं, जो अंततः इस बड़ी टूट का मुख्य कारण बनी।
राघव चड्ढा की उपनेता पद से विदाई
पार्टी के भीतर असंतोष तब और गहरा गया जब इसी महीने राघव चड्ढा को राज्यसभा में उपनेता के महत्वपूर्ण पद से हटा दिया गया। चड्ढा, जो कभी केजरीवाल के सबसे भरोसेमंद रणनीतिकार माने जाते थे, इस फैसले के बाद पार्टी से पूरी तरह कट गए। इस कदम ने साफ कर दिया कि पार्टी के शीर्ष नेतृत्व और युवा चेहरों के बीच सुलह की कोई गुंजाइश बाकी नहीं रह गई है।
भ्रष्टाचार और उत्पीड़न के गंभीर आरोप
इस्तीफा देने के बाद स्वाति मालीवाल ने सोशल मीडिया पर एक विस्तृत पोस्ट साझा की, जिसमें उन्होंने पार्टी के भीतर व्याप्त “बेकाबू भ्रष्टाचार” पर प्रहार किया। उन्होंने आरोप लगाया कि पार्टी अब महिलाओं के प्रति संवेदनहीन हो चुकी है और अरविंद केजरीवाल के संरक्षण में “गुंडा तत्वों” को बढ़ावा दिया जा रहा है। इन आरोपों ने AAP की नैतिकता और दावों पर विपक्षी दलों को हमला करने का बड़ा मौका दे दिया है।
दिग्गजों का सामूहिक दलबदल
राजनीतिक गलियारों में कुछ नेताओं की नाराजगी की चर्चा तो थी, लेकिन सात सांसदों का एक साथ पाला बदलना हर किसी के लिए चौंकाने वाला रहा। राघव चड्ढा और स्वाति मालीवाल के साथ-साथ संदीप पाठक, अशोक मित्तल, हरभजन सिंह, राजेंद्र गुप्ता और विक्रम साहनी ने भी भाजपा का दामन थाम लिया। इनमें से कई नेता ऐसे थे जिन्होंने पहले कभी सार्वजनिक रूप से अपनी नाराजगी जाहिर नहीं की थी।
ED की कार्रवाई के मायने
सांसदों के इस फैसले के पीछे केंद्रीय जांच एजेंसियों के दबाव की भी अटकलें तेज हैं। विशेष रूप से अशोक मित्तल का इस्तीफा उनके ठिकानों पर प्रवर्तन निदेशालय (ED) की छापेमारी के ठीक बाद आया है। विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम (FEMA) के तहत हुई इस कार्रवाई ने राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा छेड़ दी है कि क्या यह दलबदल केवल वैचारिक है या इसके पीछे कानूनी कार्रवाई का डर भी शामिल है।
संसद के उच्च सदन में AAP की ताकत अब सिमट कर केवल 3 सांसदों तक रह गई है। यह घटनाक्रम आगामी चुनावों में पार्टी की रणनीति और विपक्षी एकजुटता को बुरी तरह प्रभावित कर सकता है।

