Uttarakhand Politics: उत्तराखंड की राजनीति में विधानसभा चुनाव से पहले बड़ा सियासी घटनाक्रम सामने आया है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने पार्टी के सभी पदों से इस्तीफा देने का ऐलान कर दिया है। रावत के इस फैसले से प्रदेश कांग्रेस में हलचल तेज हो गई है। उनके इस्तीफे ने पार्टी के भीतर चल रहे विवादों और आगामी चुनाव की रणनीति को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
चुनाव से पहले हरीश रावत का बड़ा कदम, सहयोगियों पर लगे आरोप बने वजह
हरीश रावत के इस फैसले के पीछे उनके ओएसडी चंदन सिंह जीना को लेकर उठे विवाद को प्रमुख वजह माना जा रहा है। रावत ने अपने सहयोगी पर लगाए गए आरोपों को निराधार बताया है। उन्होंने कहा कि वह नहीं चाहते कि उनके कारण कांग्रेस संगठन किसी भी तरह कमजोर हो। उनके बयान से साफ है कि वह विवाद का असर पार्टी की चुनावी तैयारियों पर नहीं पड़ने देना चाहते।
चंदन सिंह जीना विवाद पर रावत का पलटवार, बोले- ठोस सबूत हैं तो कार्रवाई करें
अपने और अपने सहयोगियों पर लगाए जा रहे आरोपों पर हरीश रावत ने खुलकर जवाब दिया। उन्होंने कहा कि उनके करीबियों को राजनीतिक रूप से उनकी छवि खराब करने के लिए विवाद में घसीटा जा रहा है। नियुक्तियों और परीक्षाओं में कथित गड़बड़ी के आरोपों पर उन्होंने कहा कि यदि वास्तव में कोई अनियमितता हुई है तो जनता उन्हें माफ करे। साथ ही उन्होंने चुनौती दी कि यदि उनके खिलाफ कोई ठोस सबूत है तो उनके खिलाफ भी कार्रवाई की जानी चाहिए।
42 हजार सरकारी नौकरियों का दावा, रावत ने गिनाईं अपने कार्यकाल की उपलब्धियां
हरीश रावत ने अपने करीब तीन वर्ष के मुख्यमंत्री कार्यकाल का उल्लेख करते हुए कहा कि उनके शासनकाल में 42 हजार युवाओं को सरकारी नौकरियां दी गईं। उन्होंने दावा किया कि युवाओं के भविष्य को बेहतर बनाने के लिए पारदर्शी तरीके से काम किया गया। रावत ने कहा कि उनके कार्यकाल में युवाओं के हितों को प्राथमिकता दी गई और विपक्ष की ओर से पैदा की गई राजनीतिक बाधाओं को जनता भी देख चुकी है।
मुख्यमंत्री रहते केदारनाथ पुनर्निर्माण पर रहा फोकस
फरवरी 2014 से मार्च 2017 तक उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रहे हरीश रावत के कार्यकाल में केदारनाथ पुनर्निर्माण सबसे बड़ी चुनौतियों में शामिल रहा। वर्ष 2013 की विनाशकारी केदारनाथ आपदा के बाद राज्य की अर्थव्यवस्था और चारधाम यात्रा को पटरी पर लाना सरकार के सामने बड़ी चुनौती थी। रावत सरकार ने पुनर्निर्माण कार्यों को तेजी देने के साथ उत्तराखंड को सुरक्षित पर्यटन स्थल के रूप में स्थापित करने पर जोर दिया।
मिड-डे मील योजना में बदलाव, बच्चों के पोषण पर दिया जोर
रावत सरकार के दौरान स्कूली बच्चों के पोषण को लेकर भी कई पहल की गईं। मिड-डे मील योजना के मेन्यू में बदलाव करते हुए बच्चों को सप्ताह में दो बार दूध, फल और अंडे या पौष्टिक विकल्प उपलब्ध कराने की व्यवस्था शुरू की गई। इसका उद्देश्य सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों के पोषण स्तर को बेहतर करना था।
महिला सशक्तीकरण और पहाड़ी उत्पादों को बढ़ावा देने की कोशिश
हरीश रावत के मुख्यमंत्री कार्यकाल में ग्रामीण अर्थव्यवस्था और महिला सशक्तीकरण को भी प्राथमिकता दी गई। मंडवा, झंगोरा और पहाड़ी दालों जैसे स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा देने के साथ पलायन रोकने के लिए आजीविका से जुड़े प्रयास किए गए। महिलाओं के स्वयं सहायता समूहों को आर्थिक रूप से मजबूत करने और स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर बढ़ाने पर भी जोर दिया गया।
बुजुर्गों, विधवाओं और दिव्यांगों के लिए योजनाओं का विस्तार
रावत सरकार ने बुजुर्गों, विधवाओं और दिव्यांगजनों के लिए संचालित पेंशन योजनाओं को सरल बनाने और उनका दायरा बढ़ाने पर काम किया। पेंशन राशि में बढ़ोतरी के साथ लाभार्थियों तक सीधे DBT के माध्यम से भुगतान पहुंचाने की व्यवस्था को बढ़ावा दिया गया। पहाड़ी क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं को मजबूत करने के लिए मोबाइल मेडिकल यूनिट और दूरदराज के स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टरों की उपलब्धता बढ़ाने के प्रयास भी किए गए।
कांग्रेस में हरीश रावत की बड़ी भूमिका, संकटमोचक के तौर पर पहचान
हरीश रावत की पहचान केवल उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री के तौर पर नहीं है। कांग्रेस संगठन में उन्हें लंबे समय से एक संकटमोचक और रणनीतिकार के रूप में देखा जाता रहा है। राज्य गठन के बाद उत्तराखंड में कांग्रेस को संगठनात्मक स्तर पर मजबूत करने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। गढ़वाल से कुमाऊं तक विभिन्न वर्गों में उनकी राजनीतिक पकड़ को पार्टी के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।
2016 की राजनीतिक बगावत और राष्ट्रपति शासन के दौरान निभाई अहम भूमिका
वर्ष 2016 में कांग्रेस के कई विधायकों की बगावत के बाद उत्तराखंड में राजनीतिक संकट गहरा गया था और राष्ट्रपति शासन तक की नौबत आई थी। उस दौर में हरीश रावत ने राजनीतिक और कानूनी दोनों मोर्चों पर संघर्ष किया। अदालत की लड़ाई के बाद उनकी सरकार की बहाली को उनके राजनीतिक जीवन की प्रमुख उपलब्धियों में गिना जाता है।
केंद्र में भी संभाली अहम जिम्मेदारियां, राष्ट्रीय राजनीति में रही सक्रियता
हरीश रावत इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के दौर से राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय रहे हैं। केंद्र सरकार में उन्होंने श्रम, कृषि, संसदीय कार्य और जल संसाधन जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालयों की जिम्मेदारी संभाली। कांग्रेस नेतृत्व ने कई राज्यों में चुनावी रणनीति और राजनीतिक संकटों के समाधान के लिए भी उनके अनुभव का इस्तेमाल किया है।
हरीश रावत के इस्तीफे से कांग्रेस के सामने बढ़ी राजनीतिक चुनौती
हरीश रावत का पार्टी के सभी पदों से इस्तीफा ऐसे समय आया है जब उत्तराखंड में चुनावी राजनीति तेज हो रही है। वर्ष 2017 के चुनाव में कांग्रेस को सत्ता गंवानी पड़ी थी और रावत खुद भी चुनाव हार गए थे। इसके बावजूद प्रदेश की राजनीति में उनका प्रभाव कायम रहा। अब उनके इस्तीफे के बाद कांग्रेस के सामने संगठन को एकजुट रखने और चुनावी रणनीति को मजबूती देने की चुनौती बढ़ गई है।
उत्तराखंड चुनाव से पहले रावत का फैसला क्यों है अहम?
हरीश रावत का इस्तीफा महज संगठनात्मक फैसला नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे उत्तराखंड कांग्रेस की आगामी राजनीतिक दिशा से जोड़कर देखा जा रहा है। रावत के इस कदम से पार्टी के भीतर जारी मतभेद, नेतृत्व और चुनावी रणनीति को लेकर नई चर्चा शुरू हो गई है। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि कांग्रेस नेतृत्व इस घटनाक्रम को किस तरह संभालता है और हरीश रावत की आगे की राजनीतिक भूमिका क्या रहती है।

