तथ्य छिपाने पर इलाहाबाद हाईकोर्ट सख्त: याचिकाकर्ता पर ठोका 1 लाख का जुर्माना


​समानांतर कानूनी कार्यवाही और तथ्यों का दमन (Supression of Facts)
​इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने न्यायिक प्रक्रिया के दुरुपयोग पर कड़ा रुख अपनाते हुए एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। मामला श्रीमती चन्द्रमा देवी अग्रहरी बनाम राज्य सरकार का है, जिसमें आवेदिका ने धारा 482 सीआरपीसी के तहत याचिका दाखिल कर समन आदेश और आपराधिक कार्यवाही को चुनौती दी थी। हालांकि, सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि इसी विषय पर सत्र न्यायालय में पहले से ही एक आपराधिक पुनरीक्षण (Criminal Revision) लंबित था। अदालत ने कहा कि समान प्रकृति की लंबित कार्यवाही को छिपाना न केवल प्रक्रियात्मक चूक है, बल्कि यह न्यायालय के साथ गंभीर धोखाधड़ी के समान है।

​”स्वच्छ हाथ” सिद्धांत और न्यायिक ईमानदारी

​न्यायालय ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि जो व्यक्ति न्याय पाने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाता है, उसे “स्वच्छ हाथों” (Clean Hands) के साथ आना चाहिए। जस्टिस की पीठ ने कहा कि राहत पाने के लिए तथ्यों का पूर्ण प्रकटीकरण अनिवार्य है। विपक्षी पक्ष द्वारा यह आरोप लगाया गया था कि आवेदिका ने जानबूझकर पुनरीक्षण याचिका की बात छिपाई ताकि उच्च न्यायालय से अंतरिम संरक्षण (Interim Stay) प्राप्त किया जा सके। कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार करते हुए माना कि न्यायिक विवेक का लाभ केवल उन्हीं को मिलना चाहिए जो पूरी पारदर्शिता बरतते हैं।


​हाईकोर्ट नियमावली और सर्वोच्च न्यायालय के दृष्टांत

अपने निर्णय को पुख्ता करने के लिए न्यायालय ने इलाहाबाद हाईकोर्ट नियमावली (Rules of Court) के अध्याय XVIII, नियम 3(5) का हवाला दिया। इस नियम के अनुसार, याचिकाकर्ता को यह स्पष्ट घोषणा करनी होती है कि संबंधित मामले में कोई अन्य कार्यवाही लंबित नहीं है। इसके अलावा, अदालत ने S.P. Chengalvaraya Naidu बनाम Jagannath और Ramjas Foundation बनाम भारत संघ जैसे ऐतिहासिक मामलों का उल्लेख किया। इन निर्णयों के आधार पर यह रेखांकित किया गया कि तथ्यों को दबाकर प्राप्त की गई कोई भी राहत कानून की नजर में शून्य मानी जाती है और इसे “न्यायालय के साथ छल” (Fraud on Court) की श्रेणी में रखा जाता है।

अधिवक्ता की गलती और पक्षकार की जिम्मेदारी

अक्सर अदालतों में यह दलील दी जाती है कि जानकारी छिपाने में वकील की त्रुटि थी, लेकिन इस मामले में हाईकोर्ट ने इस तर्क को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कड़े शब्दों में कहा कि अधिवक्ता की गलती (Mistake of Counsel) का लाभ हर परिस्थिति में पक्षकार को नहीं दिया जा सकता, विशेषकर तब जब दो समानांतर कानूनी प्रक्रियाएं एक ही समय पर सक्रिय हों। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि भ्रामक शपथपत्र दाखिल करना और न्यायिक प्रक्रिया का मजाक बनाना बर्दाश्त नहीं किया जाएगा, क्योंकि इससे कीमती समय और संसाधनों की बर्बादी होती है।

भारी जुर्माना और वसूली के निर्देश

अंततः, न्यायालय ने आवेदिका की याचिका को खारिज करते हुए उन पर ₹1,00,000/- (एक लाख रुपये) का भारी जुर्माना (Exemplary Cost) लगाया। आदेश के अनुसार, इस राशि में से ₹30,000/- विपक्षी पक्ष संख्या-2 को मुआवजे के रूप में दिए जाएंगे, जबकि ₹70,000/- राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण के खाते में जमा होंगे। न्यायालय ने यह भी चेतावनी दी कि यदि निर्धारित समय के भीतर जुर्माने की राशि जमा नहीं की गई, तो इसकी वसूली भू-राजस्व (Land Revenue) के बकाया की तरह की जाएगी। यह फैसला भविष्य में उन याचिकाकर्ताओं के लिए एक नजीर है जो तथ्यों को छिपाकर अदालत को गुमराह करने की कोशिश करते हैं।

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