Karnataka Political Crisis: कर्नाटक में भारी सियासी उठापटक के बाद मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालने वाले डीके शिवकुमार की मुश्किलें शुरू हो गई हैं। ३ जून को बड़े तामझाम के साथ शुरू हुई नई सरकार को सत्ता में आए अभी एक हफ्ता भी नहीं हुआ था कि पहला बड़ा झटका लग गया है। कैबिनेट मंत्री बनाए गए वरिष्ठ कांग्रेस नेता रामलिंगा रेड्डी ने मंत्रिमंडल से इस्तीफा देकर सरकार की राहें मुश्किल कर दी हैं। उन्हें सौंपे गए विभागों (पोर्टफोलियो) से वे बेहद नाराज चल रहे थे, जिसके बाद उन्होंने यह कड़ा कदम उठाया।
अंदरूनी कलह और नाराजगी: मनचाहा विभाग न मिलने से टूटी वादों की डोर
रामलिंगा रेड्डी के कैबिनेट छोड़ने की सबसे बड़ी वजह मंत्रालयों का मनमाना बंटवारा है। रेड्डी का आरोप है कि सरकार गठन से पहले कांग्रेस आलाकमान और शीर्ष नेताओं द्वारा उन्हें जो आश्वासन दिए गए थे, कैबिनेट विभागों की घोषणा के वक्त उन्हें पूरी तरह दरकिनार कर दिया गया। इसी वादे की अनदेखी से आहत होकर उन्होंने पद छोड़ने का फैसला किया।
वादे और हकीकत का अंतर
अपने इस्तीफे पत्र में रामलिंगा रेड्डी ने सीधे तौर पर मुख्यमंत्री और पूर्व मुख्यमंत्री पर वादाखिलाफी का आरोप लगाया है। उन्होंने लिखा, “सिद्धारमैया के नेतृत्व में बायराथी सुरेश ने मुझे फोन कर बेंगलुरु विकास मंत्रालय देने की बात कही थी। यही नहीं, डीके शिवकुमार ने भी मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने से पहले दो बार मेरे घर आकर खुद अपनी मर्जी से मुझे बेंगलुरु का प्रभार सौंपने का वादा किया था। मैंने कभी खुद से यह नहीं मांगा था। लेकिन जब लिस्ट आई तो मुझे पहले परिवहन और फिर सिंचाई मंत्रालय थमा दिया गया। वादों के इस खेल के कारण मैं इस्तीफा दे रहा हूं।”
अब कोई समझौता नहीं
रेड्डी ने यह साफ कर दिया है कि अब पानी सिर से ऊपर जा चुका है। उन्होंने मीडिया से बात करते हुए कहा कि वह खुद जाकर मुख्यमंत्री को इस्तीफा नहीं सौंपना चाहते, इसलिए वे अतिरिक्त मुख्य सचिव (ACS) तुषार गिरिनाथ या किसी अन्य माध्यम से अपना त्यागपत्र भिजवा रहे हैं। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि उन्हें मल्लिकार्जुन खड़गे या हाईकमान से कोई शिकायत नहीं है, लेकिन अब अगर उन्हें वापस बेंगलुरु विकास मंत्रालय का प्रभार ऑफर किया जाता है, तो भी वे इसे स्वीकार नहीं करेंगे।
मुश्किलों में डीके शिवकुमार सरकार
कर्नाटक की सत्ता पर काबिज होने के लिए डीके शिवकुमार को तीन साल लंबा इंतजार करना पड़ा था। ३ जून को बेंगलुरु के लोक भवन में उन्होंने १३ से अधिक मंत्रियों के साथ भव्य समारोह में पद की शपथ ली थी। हालांकि, राजनीतिक विश्लेषक पहले से ही मान रहे थे कि शिवकुमार के लिए सरकार चलाना कांटों भरा ताज होगा, लेकिन इतनी जल्दी कैबिनेट में विद्रोह हो जाएगा और मात्र तीन दिन के भीतर सरकार संकट में घिर जाएगी, इसकी उम्मीद खुद मुख्यमंत्री को भी नहीं थी।
आगामी दिनों की चुनौतियां
रामलिंगा रेड्डी का इस्तीफा सिर्फ एक मंत्री का जाना नहीं है, बल्कि यह कैबिनेट के भीतर असंतोष की पहली चिंगारी है। बेंगलुरु की राजनीति में रेड्डी का बड़ा कद है, और उनके इस कदम के बाद अन्य नाराज विधायकों और मंत्रियों के सुर भी बदल सकते हैं। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि संकटमोचक माने जाने वाले डीके शिवकुमार सरकार को इस अंतर्विरोध से कैसे बाहर निकालते हैं।

