Super El Nino: दिल्ली-एनसीआर समेत पूरा भारत इस समय रिकॉर्ड तोड़ गर्मी और लू के थपेड़ों से जूझ रहा है. हालांकि देश के कुछ राज्यों में छिटपुट बारिश देखी जा रही है, लेकिन इससे तापमान में कोई गिरावट नहीं आई है. केरल में दक्षिण-पश्चिम मॉनसून के आगमन की खबर से लोगों के चेहरे जरूर खिले थे, लेकिन अब भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने एक चिंताजनक चेतावनी जारी की है. मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार, इस साल भारत में सामान्य के मुकाबले काफी कम बारिश होने की आशंका है. इसका मुख्य कारण ‘सुपर अल नीनो’ (Super El Nino Effect) का तेजी से सक्रिय होना है, जो देश में आने वाले बादलों को सुखा सकता है. वैज्ञानिकों का मानना है कि यह स्थिति 1997 और 2015 की तरह ही विनाशकारी और खतरनाक साबित हो सकती है.
क्या है सुपर अल नीनो संकट?
सरल शब्दों में कहें तो सुपर अल नीनो, सामान्य अल नीनो का ही एक अत्यंत उग्र और भयानक रूप है. इस प्राकृतिक घटना के दौरान प्रशांत महासागर (Pacific Ocean) के मध्य और पूर्वी हिस्से का तापमान सामान्य से बहुत अधिक बढ़ जाता है. तकनीकी रूप से, जब समुद्र की सतह का तापमान (SST) दीर्घकालिक औसत से कम से कम 2 डिग्री सेल्सियस (3.6 डिग्री फ़ारेनहाइट) ज्यादा हो जाता है, तो ‘सुपर अल नीनो’ की स्थिति उत्पन्न होती है. वहीं साधारण अल नीनो में यह तापमान 0.9 डिग्री फ़ारेनहाइट अधिक रहता है. महासागर का यह बढ़ता तापमान वैश्विक वायुमंडलीय परिसंचरण (Atmospheric Circulation) को पूरी तरह बदल देता है, जिसके परिणामस्वरूप भारतीय उपमहाद्वीप की ओर बढ़ने वाली मॉनसूनी हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं.
इतिहास और मौसम के बदलते मिजाज
पिछले 70 वर्षों के ऐतिहासिक आंकड़ों पर नजर डालें तो भारत में अल नीनो के कुल 17 मामलों में से केवल 5 बार ही सामान्य या उससे अधिक बारिश दर्ज की गई है, जबकि पिछले छह अवसरों पर देश को सूखे का सामना करना पड़ा है. रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2009 में एक कमजोर अल नीनो के चलते भारत में बारिश घटकर औसत की महज 78.2% रह गई थी, जो पिछले 37 वर्षों का सबसे निचला स्तर था. मौसम संबंधी मौजूदा पूर्वानुमानों और वैश्विक मॉडलों के अनुसार, वर्ष 2026 का यह अल नीनो बेहद मजबूत और आक्रामक होने की संभावना है, जो देश के वर्षा चक्र को पूरी तरह बिगाड़ सकता है.
कृषि आधारित अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा सीधा असर
भारत में होने वाली कुल वार्षिक वर्षा का लगभग 70% हिस्सा मॉनसून से ही आता है. देश की लगभग 4 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था में कृषि क्षेत्र की हिस्सेदारी करीब 18% है, जिससे भारत की 1.5 अरब आबादी में से आधी आबादी का भरण-पोषण होता है. यदि इस वर्ष कम बारिश होती है, तो खरीफ की मुख्य फसलों जैसे चावल, कपास और सोयाबीन के उत्पादन को भारी नुकसान पहुंचेगा. इसके अलावा, मिट्टी में नमी की कमी के कारण गेहूं और रेपसीड जैसी रबी (सर्दियों की) फसलें भी बुरी तरह प्रभावित होंगी. पैदावार घटने से भारत को खाद्य उत्पादों का निर्यात (Export) रोकना पड़ सकता है, जैसा कि 2023 में ताड़ और सोया तेल के साथ हुआ था. साथ ही, जलाशयों में पानी घटने से पनबिजली (Hydroelectricity) उत्पादन कम होगा, जिससे देश में बिजली का संकट भी गहरा सकता है.
सूखे और लू की चपेट में आएंगे ये क्षेत्र
इस मौसमी बदलाव की सबसे तगड़ी मार देश के कई राज्यों पर पड़ेगी. मध्य प्रदेश के इंदौर, उज्जैन, ग्वालियर, जबलपुर और सागर जैसे शहरों में सामान्य से बहुत कम बारिश होगी. इसके अलावा, अगस्त और सितंबर के महीनों में पंजाब, हरियाणा और राजस्थान के खेतों में सूखे जैसे हालात बन सकते हैं. दिल्ली-एनसीआर में भीषण गर्मी जारी रहेगी, जबकि दक्षिण-पूर्वी महाराष्ट्र, उत्तरी कर्नाटक, ओडिशा, गुजरात और आंध्र प्रदेश भी जल संकट से घिर सकते हैं. विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) के अनुसार, वर्ष 2026 के मध्य से यह अल नीनो वैश्विक स्तर पर अपना असर दिखाएगा, जिससे न केवल भारत बल्कि पश्चिम अफ्रीका, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया भी भीषण गर्मी से झुलसेंगे.

