Bharat Tiwari Encounter: मथुरा के विख्यात आध्यात्मिक उपदेशक और कथावाचक अनिरुद्धाचार्य जी महाराज ने बिहार में हुए कथित भरत तिवारी पुलिस एनकाउंटर (Bharat Tiwari Encounter) को लेकर राज्य सरकार और कानून व्यवस्था पर तीखा हमला बोला है। अपने एक प्रवचन के दौरान उन्होंने इस संवेदनशील मुद्दे पर खुलकर अपनी राय रखी, जिसका वीडियो अब सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। कथावाचक ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए कहा कि जब लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई सरकारें और प्रशासनिक अधिकारी आम जनता की जायज समस्याओं को अनसुना कर देते हैं, तब समाज के भीतर से ही किसी न किसी व्यक्ति को व्यवस्था के खिलाफ खड़ा होना पड़ता है। उन्होंने इस पूरे घटनाक्रम में बिहार पुलिस और शासन के रुख को पूरी तरह से अनुचित ठहराया है।
हथियार उठाने के पीछे प्रशासनिक बहरेपन का तर्क
अनिरुद्धाचार्य ने अपने संबोधन में कहा कि जब उस युवक (भरत तिवारी) ने जनहित के कार्यों के लिए बार-बार सरकारी दफ्तरों और अफसरों के चक्कर काटे और कोई सुनवाई नहीं हुई, तब निराश होकर उसने बंदूक उठाई थी। उन्होंने तर्क दिया कि उसने किसी बेगुनाह नागरिक की हत्या या कोई गंभीर अपराध नहीं किया था, बल्कि वह केवल भ्रष्ट तंत्र के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद कर रहा था। कथावाचक ने शासक वर्ग को चेतावनी देते हुए कहा कि जनता के दुखों को दूर करने के बजाय नागरिकों पर बल प्रयोग करना और उनकी जान लेना किसी भी राजा या शासक के लिए नैतिक और धार्मिक रूप से महापाप की श्रेणी में आता है। ऐसी स्थिति में जनता अपने नेतृत्वकर्ता को ‘पापी राजा’ के रूप में देखने लगती है।
अपराधी और सुधारवादी के बीच अंतर स्पष्ट करने की मांग
मुठभेड़ की नीति पर कड़ा प्रहार करते हुए अध्यात्म गुरु ने कहा कि भारतीय संस्कृति और सनातन परंपरा में ‘शरण में आए हुए’ व्यक्ति की रक्षा का विधान है, उसे मारना घोर अधर्म है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि वह व्यक्ति समाज के लिए खतरा होता या कोई खूंखार आतंकवादी होता, तो सुरक्षाबलों द्वारा की गई कार्रवाई पूरी तरह से न्यायसंगत मानी जाती। परंतु, जो व्यक्ति अपने गांव, समाज और जनहित के अधिकारों के लिए बहरे हो चुके सिस्टम से जंग लड़ रहा हो, उसे ही मौत के घाट उतार देना किसी भी प्रकार से न्यायोचित नहीं है। उन्होंने तंत्र को सुधारने के बजाय आवाज उठाने वालों को दबाने की नीति की कड़े शब्दों में निंदा की।
नेताओं के रवैये पर तीखा कटाक्ष
कथावाचक ने राजनीतिक दलों और नेताओं की अवसरवादिता पर भी तंज कसा। उन्होंने कहा कि चुनाव के समय जनता से वोट मांगने वाले जनप्रतिनिधि सत्ता में आते ही अपनी ही जनता का दमन शुरू करवा देते हैं। पुलिस प्रशासन के एक्शन पर असंतोष व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि केवल आधुनिक और किताबी शिक्षा पाना ही काफी नहीं है, बल्कि सुरक्षाबलों और अधिकारियों में मानवीय संस्कारों का होना भी अनिवार्य है। उन्होंने कहा कि काश हमारे प्रशासनिक अमले को ‘रामचरितमानस’ के उन नैतिक पाठों को पढ़ाया गया होता, जहां यह सिखाया गया है कि शरणागत की रक्षा करना सर्वोपरि धर्म है और इस मर्यादा का उल्लंघन करना प्रशासनिक और सामाजिक पतन का कारण बनता है।

