UP News: उत्तर प्रदेश की राज्यपाल आनंदी बेन पटेल ने वाराणसी के केंद्रीय कारागार में आजीवन कारावास की सजा भुगत रहे बंदी अंजनी सिंह की समय पूर्व रिहाई की उम्मीदों पर पूरी तरह पानी फेर दिया है। गाजीपुर के मरदह क्षेत्र के रहने वाले अंजनी सिंह द्वारा प्रस्तुत की गई दया याचिका को राज्यपाल ने गहन समीक्षा के बाद खारिज कर दिया। शासन की ओर से जारी आदेश में स्पष्ट किया गया है कि प्रशासनिक और सुरक्षात्मक कारणों के चलते इस अपराधी को रिहा करना जनहित में उचित नहीं है।
वर्ष 2006 के जघन्य हत्याकांड का विवरण और अदालती फैसला
शासन के उपसचिव कमलेश कुमार द्वारा जारी आधिकारिक पत्र के अनुसार, यह मामला 29 मई 2006 का है। गाजीपुर के मरदह थाना क्षेत्र स्थित ग्राम हरहरी में अंजनी सिंह ने अपने अन्य साथियों—कांता सिंह, रामजी सिंह, लक्ष्मण सिंह और संजय सिंह के साथ मिलकर मामूली विवाद में लालता सिंह की हत्या कर दी थी। वारदात में लाइसेंसी बंदूक का इस्तेमाल किया गया था। इस मामले की गंभीरता को देखते हुए गाजीपुर की फास्ट ट्रैक कोर्ट ने 20 अक्टूबर 2010 को अंजनी सिंह और कांता सिंह को दोषी करार देते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा आजीवन कारावास की सजा पर अंतिम मुहर
इस मामले में कानूनी प्रक्रिया काफी लंबी चली। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दिसंबर 2016 में अंजनी सिंह की अपील पर सुनवाई करते हुए उसे दोषमुक्त कर दिया था, लेकिन न्याय का सफर यहीं नहीं रुका। मामला देश की शीर्ष अदालत यानी उच्चतम न्यायालय पहुँचा। 31 अगस्त 2017 को सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को रद्द करते हुए सत्र न्यायालय द्वारा दी गई आजीवन कारावास की सजा को यथावत रखने का आदेश दिया। इसी आदेश के बाद अंजनी सिंह को अपनी शेष सजा काटने के लिए पुनः जेल जाना पड़ा।
जिला मजिस्ट्रेट और पुलिस प्रशासन की प्रतिकूल रिपोर्ट बनी बाधा
बंदी की समय पूर्व रिहाई की राह में स्थानीय प्रशासन की रिपोर्ट सबसे बड़ी रुकावट साबित हुई। गाजीपुर के जिला मजिस्ट्रेट और पुलिस अधीक्षक ने अपनी संयुक्त आख्या में स्पष्ट किया कि यदि इस अपराधी को समय से पहले रिहा किया जाता है, तो भविष्य में अपराध की पुनरावृत्ति होने की प्रबल आशंका है। स्थानीय पुलिस ने भी सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए रिहाई का कड़ा विरोध किया। प्रशासन का मानना था कि अपराधी के बाहर आने से क्षेत्र की शांति व्यवस्था भंग हो सकती है।
अनुच्छेद-161 के तहत राज्यपाल का संवैधानिक निर्णय
दया याचिका समीक्षा समिति ने पाया कि 21 मार्च 2024 तक अंजनी सिंह ने बिना पैरोल के केवल 12 वर्ष 11 माह की सजा काटी है। समिति का तर्क था कि इतने संगीन जुर्म के लिए इतनी कम सजा काटकर रिहा होने से समाज में एक नकारात्मक संदेश जाएगा। इन सभी तथ्यों और संवैधानिक मर्यादाओं को ध्यान में रखते हुए, राज्यपाल आनंदी बेन पटेल ने संविधान के अनुच्छेद-161 के तहत प्रदत्त शक्तियों का उपयोग करते हुए दया याचिका को आधिकारिक तौर पर अस्वीकार कर दिया।
शासन का आगामी कदम और विभागीय अधिकारियों की प्रतिक्रिया
राज्यपाल के इस कड़े फैसले के बाद जेल प्रशासन और स्थानीय विभाग अपनी अगली कार्यवाही में जुट गए हैं। जिला प्रोबेशन अधिकारी संजय सोनी ने बताया कि शासन से प्राप्त पत्र के आधार पर सभी आवश्यक औपचारिकताओं को पूरा किया जा रहा है। गौरतलब है कि इस मामले के अन्य सह-आरोपियों में से कांता सिंह की सजा के दौरान जेल में मृत्यु हो चुकी है, जबकि अन्य आरोपियों को विभिन्न अदालती स्तरों पर पहले ही बरी किया जा चुका है। अब अंजनी सिंह को अपनी पूरी सजा वाराणसी जेल की सलाखों के पीछे ही काटनी होगी।

