UP Politics: महिला आरक्षण संशोधन विधेयक को लेकर उत्तर प्रदेश की राजनीति में उबाल आ गया है। भाजपा नेता अपर्णा यादव द्वारा समाजवादी पार्टी और कांग्रेस का झंडा जलाए जाने की घटना ने एक नया विवाद खड़ा कर दिया है। इस कृत्य के बाद विपक्ष ने एकजुट होकर भाजपा और अपर्णा यादव पर तीखा हमला बोला है, जिससे राज्य का राजनीतिक पारा चढ़ गया है।
सपा एमएलसी आशुतोष सिन्हा का प्रहार
समाजवादी पार्टी के विधान परिषद सदस्य (MLC) आशुतोष सिन्हा ने इस घटना पर कड़ी आपत्ति जताई है। उन्होंने इसे एक घृणित और छोटी मानसिकता वाला कृत्य करार दिया। सिन्हा ने स्पष्ट किया कि समाजवादी पार्टी हमेशा से महिलाओं के अधिकारों और उनके आरक्षण के पक्ष में रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा इस विधेयक के जरिए अपनी अलग राजनीतिक मंशा साध रही है। झंडा जलाने की तस्वीर को अनुचित बताते हुए उन्होंने मांग की कि इस मामले में FIR दर्ज की जानी चाहिए।
कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष अजय राय की निंदा
उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष अजय राय ने भी इस विरोध प्रदर्शन को लोकतांत्रिक मर्यादाओं का उल्लंघन बताया। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार ने विशेष सत्र बुलाकर जनता को भ्रमित करने की कोशिश की है। अजय राय के अनुसार, किसी राजनीतिक दल के झंडे को जलाना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है और इसकी जितनी निंदा की जाए वह कम है। उन्होंने जोर देकर कहा कि देश जानता है कि महिलाओं के हक के लिए वास्तव में किसने संघर्ष किया है।
अखिलेश यादव का वैचारिक जवाब
सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने सीधे तौर पर नाम लिए बिना इस घटना पर अपनी दार्शनिक और राजनीतिक प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि झंडा जलाना केवल एक राजनीतिक विरोध नहीं, बल्कि भावनाओं को ठेस पहुँचाने जैसा है। अखिलेश ने लाल रंग का महत्व समझाते हुए कहा कि यह क्रांति, हनुमान जी, देवियों और सुहाग का प्रतीक है। उन्होंने चेतावनी दी कि किसी भी दल या विचारधारा के प्रतीकों का अपमान करना सही नहीं है, क्योंकि हर रंग किसी न किसी आस्था से जुड़ा होता है।
भाजपा की आक्रामक रणनीति और विपक्ष की घेराबंदी
महिला आरक्षण विधेयक के संसद में अटकने (या विरोध होने) के बाद से भाजपा रक्षात्मक होने के बजाय आक्रामक रुख अपना रही है। अपर्णा यादव की झंडा जलाते हुए तस्वीर ने जहाँ भाजपा कार्यकर्ताओं में जोश भरा है, वहीं विपक्षी खेमे ने इसे अमर्यादित आचरण बताते हुए घेराबंदी शुरू कर दी है। अब यह मुद्दा केवल महिला आरक्षण तक सीमित न रहकर ‘दलों के सम्मान और प्रतीकों के अपमान’ की लड़ाई बन गया है।

