Maulana Jarjis Ansari Statement: मथुरा में श्री कृष्ण जन्मभूमि स्थल को लेकर चल रहे कानूनी और सामाजिक विवाद के बीच, मौलाना जर्जिस अंसारी के एक पुराने और विवादित बयान ने सोशल मीडिया पर नया हंगामा खड़ा कर दिया है। वायरल हो रहे एक वीडियो में मौलाना ने दावा किया है कि भगवान श्री कृष्ण आस्था से मुस्लिम थे और वे दिन में पांच बार नमाज पढ़ते थे। हालांकि यह बयान काफी पुराना बताया जा रहा है, लेकिन जन्मभूमि विवाद के मौजूदा संवेदनशील माहौल में इसके दोबारा सामने आने से हिंदू संगठनों में भारी आक्रोश है। विभिन्न सनातन संस्थाओं ने इस बयान पर कड़ा विरोध जताते हुए मौलाना की तुरंत गिरफ्तारी और उनके खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की मांग की है।
श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोक की मनगढ़ंत व्याख्या और नमाज से जोड़ने का दावा
मौलाना जर्जिस अंसारी ने अपने एक भाषण के दौरान हिंदू धर्म के पवित्र ग्रंथ श्रीमद्भगवद्गीता के एक श्लोक का हवाला देकर अपने दावों को सही ठहराने की कोशिश की। उन्होंने गीता के छठे अध्याय के दसवें श्लोक—‘योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः। एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः’—को उद्धृत किया। मौलाना ने मंच से दावा कर दिया कि इस श्लोक में भक्तों को पूरे शरीर से इबादत (पूजा) करने का निर्देश दिया गया है, जो नमाज की शारीरिक मुद्राओं से मिलता-जुलता है। इसी तर्क के आधार पर उन्होंने यह विवादित बात कही कि भगवान श्रीकृष्ण स्वयं दिन में पांच वक्त की नमाज अदा करते थे।
गीता के श्लोक का वास्तविक और आध्यात्मिक अर्थ
धार्मिक विशेषज्ञों और संस्कृत विद्वानों के अनुसार, मौलाना जर्जिस ने अपने राजनीतिक या व्यक्तिगत एजेंडे के तहत श्रीमद्भगवद्गीता के इस श्लोक का पूरी तरह से गलत और भ्रामक अर्थ निकाला है। वास्तव में, यह श्लोक ध्यान योग (आत्म-संयम योग) से जुड़ा है। इसका सच्चा संदेश है:
“एक योगी या साधक का परम कर्तव्य है कि वह निरंतर अपने मन, शरीर और अंतरात्मा को परमात्मा के चिंतन में लगाए। उसे एकांत स्थान पर अकेले रहकर, अपनी इंद्रियों व इच्छाओं पर पूर्ण नियंत्रण पाते हुए सांसारिक मोह-माया से मुक्त होना चाहिए।”
इस पूरे श्लोक या इसके संदर्भ में दूर-दूर तक नमाज, इस्लाम या किसी विशेष मजहबी पद्धति का कोई उल्लेख नहीं है। यह विशुद्ध रूप से आंतरिक साधना और ध्यान की पद्धति का वर्णन करता है।
संतों और सनातन समाज की तीखी प्रतिक्रिया
मौलाना का यह कथित वीडियो इंटरनेट पर फैलते ही साकेत भवन मंदिर के महंत सीताराम दास ने इस पर अत्यंत तीव्र आपत्ति दर्ज कराई है। उन्होंने मौलाना की इस व्याख्या को पूरी तरह बेबुनियाद और सनातन धर्म का अपमान बताया। महंत सीताराम दास ने कहा कि इस तरह के कट्टरपंथी विचार समाज में वैमनस्य फैलाने का काम करते हैं।
उन्होंने स्पष्ट शब्दों में चेतावनी दी कि मौलाना को अपनी इन अर्थहीन बातों को तुरंत वापस लेना चाहिए और पूरे सनातनी समुदाय से सार्वजनिक रूप से माफी मांगनी चाहिए। जब तक वे क्षमा नहीं मांगते, हिंदू समाज इस मुद्दे को छोड़ने वाला नहीं है। उन्होंने उत्तर प्रदेश सरकार और प्रशासन से अपील की है कि धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के आरोप में मौलाना पर सख्त से सख्त कानूनी धाराएं लगाई जाएं।

